ग़ज़ल आलम खुरशीद
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लुत्फ़ हमको आता है अब फ़रेब खाने में
आज़माए लोगों को रोज़ आज़माने में !!
दो घड़ी के साथी को हमसफ़र समझते हैं
दो घड़ी के साथी को हमसफ़र समझते हैं
किस क़दर पुराने हैं हम नए ज़माने में !!
तेरे पास आने में आधी उम्र गुज़री है
आधी उम्र गुज़रेगी तुझसे दूर जाने में
एहतियात रखने की कोई हद भी होती है
भेद हम ने खोले हैं, भेद को छुपाने में !!!
ज़िन्दगी तमाशा है और इस तमाशे में
खेल हम बिगाड़ेंगे , खेल को बनाने में
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